सड़क किनारे खड़े व बैठे जानवर होने से हो रहे दुर्घटना इसके जवाबदार कौन, बेपरवाह पशुपालक, खुद के लाभ लेने के बाद जानवर पराए व शासन प्रशासन जो आदेश जारी करते हैं पर कारवाई नहीं करते ।

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–बिलासपुर से कोरबा तक फैले नेशनल हाईवे पर हर दिन एक ख़ामोश ख़तरा मंडरा रहा है – आवारा मवेशी। ये मूक प्राणी खुद नहीं बोलते, लेकिन इनके कारण हो रही दुर्घटनाएँ चीख-चीख कर सिस्टम की नाकामी को उजागर कर रही हैं।जाली मटियारी ओवरब्रिज, चौक-चौराहे, सर्विस रोड हो या गांव के किनारे, हर जगह इन मवेशियों की मौजूदगी अब आम दृश्य बन चुकी है। लेकिन “आम” होता गया ये दृश्य, कई घरों में “सन्नाटा” बनकर बैठ गया है। तेज रफ्तार में भागते वाहन, अंधेरे में अचानक सामने आया मवेशी, और फिर – ब्रेक की चीखती आवाज़ के बाद मौत की ख़ामोशी।रात होती है और डर जागता हैरात का समय, अंधेरे में डूबी सड़कें और मवेशियों की अनदेखी उपस्थिति – यह एक ऐसा त्रिकोण बनाता है, जिसमें कई बार जिंदगी फँस जाती है। टोल नाका से लेकर पेड्रीडीह और तक, रात में सफर करने वाले हर चालक के मन में यही डर रहता है – “कहीं अचानक कोई मवेशी सामने न आ जाए।” कई जाने जा चुकी हैं, कई घायल हैं, और कई परिवारों का अब कोई सहारा नहीं।प्रशासन की आंखें मूंदे बैठी व्यवस्थाबार-बार निर्देश, बार-बार अभियान, लेकिन परिणाम – शून्य। कार्रवाई के नाम पर एक-दो दिन की मुहिम चलाई जाती है और फिर सबकुछ वैसा ही छोड़ दिया जाता है जैसा था। मवेशी फिर से सड़कों पर, और सड़कें फिर से मौत के जाल में तब्दील।बेपरवाह पशुपालक – खुद के लाभ के बाद जानवर भी पराएकई पशुपालक सुबह-सुबह अपने मवेशियों को सड़कों पर ऐसे छोड़ देते हैं जैसे वो अब उनके नहीं रहे। फसल पकने लगी तो मवेशियों को खदेड़ दिया शहर की ओर। और जब मवेशी की दुर्घटना में मौत हो जाए तो मुआवजे के लिए दावा। ये कैसी मानसिकता है, जिसमें जानवर भी उपभोग की वस्तु बनकर रह गए हैं?आवारा नहीं, मजबूर हैं ये मवेशी – लेकिन खतरा बन चुके हैंइन मूक जीवों की गलती नहीं, पर आज वे सड़कों पर सबके लिए ख़तरा बन चुके हैं – खुद के लिए भी, और इंसानों के लिए भी। इन्हें सुरक्षा की ज़रूरत है, लेकिन उससे पहले इंसान को ज़िम्मेदार बनने की ज़रूरत है।क्या किसी मंत्री, अधिकारी या नेता का वाहन इस खतरे से टकराए बिना जागेगा सिस्टम?प्रशासन को अब “आदेश” नहीं, “एक्शन” की ज़रूरत है। पशुपालकों पर कड़ी कार्रवाई, ट्रैफिक विभाग की सख्ती, और स्थायी समाधान के लिए गोकशी केंद्र या आश्रय स्थल की तत्काल व्यवस्था ही एकमात्र रास्ता है।
वरना नेशनल हाईवे का हर मोड़, हर पुल, हर सड़क आने वाले दिनों में एक और हादसे की पृष्ठभूमि तैयार करता रहेगा।

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