नवदुर्गा समिति गायत्री चौक ठोकन पारा लखराम में चल रही सरस संगीत में श्रीमद् देवी भागवत नवान्ह में कथा व्यास पंडित सत्यव्रत तिवारी जी के द्वारा देवी का महत्व को इस प्रकार देवी भागवत पुराण में देवी की महिमा बहुत सुंदर ढंग से वर्णित है

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जितेंद्र कुमार साहू लखराम के रिपोर्ट

सरस संगीत में श्रीमद् देवी भागवत नवान्ह कथा यज्ञ नवदुर्गा समित गायत्री चौक ठोकन् पारा लखराम चल रही है सरस संगीत में श्रीमद् देवी भागवत नवान्ह में कथा व्यास पंडित श्री सत्यव्रत तिवारी जी के द्वारा देवी का महत्म का इस प्रकार है, देवीभागवत पुराण में देवी की महिमा बहुत सुंदर ढंग से वर्णित है।
त्रिगुणात्मक शक्ति का वर्णन
देवीभागवत के अनुसार आद्या शक्ति ही सम्पूर्ण सृष्टि की मूल कारण है।
उनकी शक्ति तीन गुणों के रूप में प्रकट होती है—
सत्वगुण – शांति, ज्ञान और संरक्षण की शक्ति (जो श्री विष्णु में प्रकट होती है)।
रजोगुण – सृजन, उत्साह और कर्म की शक्ति (जो श्री ब्रह्मा में प्रकट होती है)।
तमोगुण – संहार, स्थिरता और विश्राम की शक्ति (जो शिव में प्रकट होती है)।

देवी ही इन तीनों गुणों की अधिष्ठात्री हैं। इन्हीं से जगत की उत्पत्ति, पालन और संहार होता है।
इसलिए उन्हें “त्रिगुणात्मक शक्ति” कहा गया है।
देवीभागवत में राम कथा संक्षेप में बताई गई है
रावण ने सीता का हरण किया।
राम ने हनुमान, सुग्रीव, वानर-भालुओं की सहायता से रावण पर विजय पाई।
अंत में अयोध्या लौटकर राम का राज्याभिषेक हुआ।
इस कथा में विशेष रूप से यह कहा गया कि राम ने भी शक्ति की उपासना करके रावण पर विजय पाई।
देवी की कृपा से उन्हें तेजस्वी सुदर्शन चक्र प्राप्त हुआ।
इसी चक्र से भगवान विष्णु ने असुरों का संहार कर धर्म की रक्षा की।


इससे स्पष्ट होता है कि विष्णु की शक्ति भी देवी से ही प्राप्त होती है।
श्रीकृष्ण द्वारा भगवती की आराधना का महत्व
महाभारत युद्ध से पहले श्रीकृष्ण ने अर्जुन के लिए देवी दुर्गा की आराधना की ताकि विजय प्राप्त हो।
देवीभागवत में कहा गया है—
भगवान कृष्ण ने देवी की स्तुति कर उन्हें प्रसन्न किया।
देवी ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि “धर्म की रक्षा के लिए विजय निश्चित है।”


इससे यह शिक्षा मिलती है कि भगवती की कृपा बिना देवता भी पूर्ण सामर्थ्य नहीं पा सकते।
देवी की उपासना शक्ति, विजय और धर्म की रक्षा के लिए अनिवार्य है।
देवी ही तीनों गुणों की अधिष्ठात्री हैं।
राम और विष्णु ने भी युद्ध में विजय के लिए देवी की उपासना की।
सुदर्शन चक्र देवी की कृपा से मिला।
कृष्ण ने भी युद्ध के समय भगवती की आराधना की। समस्त श्र् द्वालु गण रस पान किया गया।

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