माताओं ने संतान की लंबी उम्र की कामनाएं करते हुए आज शनिवार को हलषष्ठी का त्योहार मनाया गया
माताओं ने संतान की लंबी उम्र की कामनाएं करते हुए आज शनिवार को हलषष्ठी का त्योहार मनाया गया। यह पर्व भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। संतान प्राप्ति व उनके दीर्घायु सुखमय जीवन की कामना रखकर माताएं इस व्रत को रखती हैं। इस दिन माताएं सूबह से ही महुआ पेड़ की डाली का दातून कर स्नान कर व्रत धारण करती है। भैंस के दुध की चाय पीती हैं तथा दोपहर के बाद घर के आंगन में मंदिर, देवालय या गांव के चौपाल आदि में बनावटी तालाब सगरी बनाकर उसमें जल भरते है। सगरी का जल जीवन का प्रतीक है। तालाब के पार मे बेर, पलाश, गुलर आदि पेड़ की टहनियों तथा काशी के फूल को लगाकर सजाते हैं।

सामने एक चौकी या पाटे पर गौरी-गणेश कलश रखकर हलषष्ठी देवी की मूर्ति भैंस के घी में सिन्दुर से बनाकर उनकी पूजा करते है। साड़ी आदि सुहाग की सामग्री भी चढ़ाते है तथा हलषष्ठी माता के छह कहानी को कथा के रूप मे श्रवण करते है। इस पूजन की सामग्री मे पसहर चावल या बिना हल जुते हुए जमीन से उगा हुआ धान का चावल, महुआ के पत्ते, धान की लाई, भैंस के दुध, दही व घी आदि रखते है। बच्चों के खिलौने जैसे भौंरा बाटी आदि भी रखा जाता है । इस व्रत के बारे मे पौराणिक कथा यह है कि वासुदेव-देवकी के 6 बेटों को एक-एक कर कंस ने कारागार में मार डाला। जब सातवें बच्चे के जन्म का समय नजदीक आया तो देवर्षि नारद ने देवकी को हलषष्ठी देवी के व्रत रखने की सलाह दिया। देवकी ने इस व्रत को सबसे पहले किया जिसके प्रभाव से उनके आने वाले संतान की रक्षा हुई।इस दिन उपवास रखने वाली माताएं हल चले वाले जगहों पर भी नही जाती है।

