सत्य और धर्म की रक्षा सर्वोपरि है, विपत्ति में भी धैर्य और वचनपालन करना चाहिए , सुरज देवांगन के अभिन्य को देखकर श्रोताओं के आंखें भर आईं ।

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जितेंद्र कुमार साहू लखराम के रिपोर्ट

सरस संगीत में श्रीमद् देवी भागवत नवान्ह कथा यज्ञ नवदुर्गा समित गायत्री चौक ठोकन् पारा लखराम चल रही है सरस संगीत में श्रीमद् देवी भागवत नवान्ह में कथा व्यास पंडित श्री सत्यव्रत तिवारी जी के द्वारा देवी का महत्म का इस प्रकार है, देवीभागवत पुराण में राजा हरिश्चन्द्र की कथा – धर्मप्रिय राजा हरिश्चन्द्र अयोध्या के इक्ष्वाकु वंश के सत्यव्रती और दानी राजा थे।महर्षि विश्वामित्र ने यज्ञ के लिए उनसे दान माँगा। हरिश्चन्द्र ने वचन निभाते हुए पूरा राज्य दे दिया।

दक्षिणा चुकाने के लिए उन्होंने पत्नी शैव्या (तारामती) और पुत्र रोहिताश्व सहित नगर छोड़ दिया।दक्षिणा देने हेतु उन्होंने पत्नी-पुत्र को दास-दासी के रूप में बेचा और स्वयं काशी के श्मशान में डोम वीरबाहु के यहाँ सेवा करने लगे।एक दिन पुत्र रोहिताश्व की सर्पदंश से मृत्यु हो गई। शैव्या शव लेकर श्मशान पहुँची पर काष्ठ के लिए शुल्क न दे सकीं।कर्तव्यनिष्ठ हरिश्चन्द्र ने शुल्क माँगा, तब रानी ने आँचल देने की बात कही। तब राजा ने पत्नी-पुत्र को पहचान कर भी धर्म-कर्तव्य से न हटे।उसी समय देवता प्रकट हुए और बताया कि यह सब उनकी सत्य-धर्म की परीक्षा थी।देवी-देवताओं ने पुत्र को जीवित कर दिया और राजा को उसका राज्य वापस मिला।सत्य और धर्म की रक्षा सर्वोपरि है।विपत्ति में भी धैर्य और वचनपालन करना चाहिए।

सत्यव्रत और धर्म के पालन से अंततः सत्य की विजय और ईश्वर की कृपा मिलती है।देवी भागवत कहती है कि हरिश्चन्द्र की कथा सुनने-सुनाने से पाप दूर होते हैं और पुण्य की प्राप्ति होती है।

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